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Wednesday, October 20, 2010

युवाओं में नैतिक मूल्यों की कमी ,"आपसे" सुझाव आमंत्रित....

{चित्र गूगल से साभार}
वन्दे मातरम !!
मै आपका अपना गौरव शर्मा "भारतीय"  आप समस्त आत्मीय जनों को ह्रदय से प्रणाम करता हूँ,  एवं "अभियान भारतीय" को आप सभी से मिल रहे मार्गदर्शन एवं समर्थन के लिए सादर आभार व्यक्त करता हूँ, विदित हो की महज दो माह में ही देश के विभिन्न हिस्सों में इस अभियान को मिलने वाली लोकप्रियता ने हममे अद्भुत उत्साह का संचार किया है  इस अभियान को जन जन तक पहुँचाने के लिए मै आपके सहृदय सहयोग को अनवरत बनाये रखने की कामना भी करता हूँ | संस्कार, संस्कृति एवं नैतिक मूल्यों की कमी आज के युवाओं में स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होने लगा है, इसी विषय पर अपने विचारों के आप तक पहुँचाने तथा आपके विचारों एवं सुझावों को जानने के उद्देश्य से मै आज उपस्थित हूँ |
                    युवक हमारे भावी कर्णधार होते हैं, आज के युवा कल  के वयस्क और मार्गदर्शक हैं अतः राष्ट्र के विकास में युवकों की भूमिका स्वतः सिद्ध है | नवयुवक सदा से अपना सर्वस्व बलिदान करके राष्ट्र को गौरवान्वित करते आये हैं, परन्तु वर्तमान में हमारे देश की युवा पीढ़ी में संस्कारों एवं नैतिक मूल्यों का विघटन स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होने लगा है, निश्चित ही हमारा राष्ट्र प्रगति के पथ पर द्रुत गति से अग्रसर है ऐसी स्थिति में देश के युवाओं के सोच का दायरा बढ़ना उनका नवीनता और आधुनिकता की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है पर हम इस आधुनिकता के जाल में फंसकर अपनी महान पुरातन संस्कृति, प्राचीन परम्पराओं एवं संस्कारों को विस्मृत कर दें यह उन पूर्वजों के प्रति अन्याय होगा जिन्होंने अपने संस्कार, संस्कृति एवं परम्पराओं को संजोकर रखने हेतु अपना जीवन हंसकर कुर्बान कर दिया |
               आज के युवाओं के सोंचने का नजरिया बदला है, पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण के कारण युवा अपने नैतिक मूल्यों, परिवार, समाज एवं देश के प्रति अपने कर्तव्यों से विमुख होता जा रहा है उन्हें  केवल अपने सुनहरे भविष्य के निर्माण की चिंता ही खाए जा रही है पर अपने देश के विषय पर विचार विमर्श करने के लिए समय तक नहीं है यह निश्चित ही दुखदायी है |
मेरा उद्देश्य युवाओं को कटघरे में खड़ा क रना कतई नहीं है, साथ ही यह बातें सभी युवाओं पर लागु भी नहीं होती क्योंकि आज हमारी इसी युवा पीढ़ी ने भारत को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित भी किया है,  इस पोस्ट के माध्यम से उन युवाओं से जिन्होंने इन मूल्यों को विस्मृत कर दिया है, से विनम्र अपील है की वे देश के विकास के मुख्यधारा में शामिल होकर देश को विश्वगुरु के स्थान पर प्रतिष्ठित करने में अपना अमूल्य योगदान देवें, हमारे पूर्वजों से प्राप्त संस्कारों, देश की महान संस्कृतिओ को अपने मानसपटल से विस्मृत न होने दें| साथ ही मै अपने वरिष्ठजनों एवं मार्गदर्शकों से भी सादर निवेदन करता हूँ की वे हमें अपने विचार, अपने सुझाव अवश्य प्रेषित करें जिसे हम "अभियान भारतीय" के माध्यम से युवाओं तक पहुंचाकर उन्हें अपने संस्कार अपनी संस्कृति अपने नैतिक मूल्यों से पुनः परिचित करा सकें|
वन्दे मातरम .....

8 comments:

  1. मैंने पढ़ा था कि किसी ५ साल के बच्चे से दुर्गा माँ की फोटो की ओर इशारा करते हुए पूछा "बेटा ये कोन है??" तो बच्चे का जवाब था :---"लोयन वाली औरत, जो इस लोयन के ऊपर बैठी है,
    ब्यक्ति ने गणेश भगवान् के बारे में पूछा तो बच्चा गणेश जी को.Elephannt God.संबोधित करते हुए बच्चा पाया गया| अब बताओ इसमे उस बच्चे का कसूर ही क्या है? जब कभी भी उस परिवार के सदस्य ने उसको ये बताने की कोशिश नही की कि बेटा ये दुर्गा माता है जिनका वहां शेर है या ये गणेश भगवान् जी है जिनका मुह हाथी की सूंड जैसा होता है तो उसको कैसे पता चलता?

    जब हम छोटे थे तो हमारे पास एक नैतिक शिक्षा की किताब होती थी जिनमे कि बहुत अच्छी अच्छी कहानिया होती थी जिनको पड़कर बहुत आनंद आता था और एक बार मन में उन जैसा बनने की तीव्र इच्छा होती थी, लेकिन शायद आजकल उस नैतिक शिक्षा की किताब का अर्थ ही बदल गया है, उसका कोई महत्व ही नही रह गया है. मुझे तो लग रहा है कि शायद आज वो नैतिक शिक्षा की किताब स्कूलों से गायब भी हो चुकी होगी.

    शायद ही अब किसी बच्चे को वो दादा दादी की कहानिया सुनने को मिलती होंगी, वो लोरी वो गीत सुनने को मिलते होंगे और शायद न ही कोई माँ बाप के पास इतना समय है कि वो अपने बच्चे को संस्कारित होने के संस्कार दे सकें. आज महात्मा गांधी, भगत सिंह, विवेकनन्द, लाल बहादुर शास्त्री केवल या तो उनके जन्म दिवस के मोके पर ही याद किए जाते है या उनके निर्वाण दिवस पर, आज वो हमारे घरों से नदारद है, हमारे दादा-दादियों की कहानियो से नदारद है, हमारे माँ बाप की जुबान से बहुत दूर है, हमारे आस से दूर है और हमारे पड़ोस से दूर है. तो कैसे हम ये आशा कर सकते है कि हमारे बच्चों से अच्छे संस्कार आयें? अच्छे संस्कार देने के लिए हमारे पास तो समय नही है, जो उनको अच्छे संस्कार दे सकते थे उनको तो उपेक्षित किया जाता है, जिन पुस्तकों को पढने से उनको संस्कारित किया जा सकता है उनका स्थान कोमिक्स, खिलोने और कोम्प्टर गेम्स ने ले लिया है, तो कैसे हम ये आश कर सकते है.

    इसके बारे में हमको ख़ुद सोचना चाहिए क्योंकि कल हमें भी किसी का माँ / बाप और दादा/दादी बनना है. हम ये निश्चय करते है कि हमारी संतान किस दिशा में जा रही है और हम उनको क्या संस्कार दे रहे है. इसका और कोई जिम्मेदार नही है, केवल हम ही है.

    आभाव में घिरा हुवा है बचपन मेरे देश का यूं आंकड़ो की भाषा में ना हमे उल्झायिये
    दो वक़्त की रोटी जिनको नहीं मिली यारो उन्हें हलवा पुड़ी के ना स्वाद समझाईये
    सेक्स education की बात ना करो यहाँ पे बच्चो को शहीदों के चरित्र समझाईये
    पचपन के बूढों को पकड़ के पढ़ने वालों नन्हे बच्चो को भी नैतिक मूल्य समझाईये
    नमः पार्वती पतेः हर हर महादेव

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  2. sanskar koi bhi vyakti apni ma ke garbh se nahi pata hai aaj jo bhi bacha apne pariwar me ya samaj me dekhta hai wohi sikhta hai isme galti us bache ki nahi varan uske palkon ki hai jo us bache ko inse vanchit rakhte hain or baad me jab wo bada ho jata hai to use dosh dete hain ki ye hamare sanskaro me to nahi hai jabki balyawastha me to apne hi use samay nahi diya

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  3. ... भावपूर्ण एवं सार्थक अभिव्यक्ति ... प्रसंशनीय पोस्ट !!!

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  4. बहता दरिया जहां तक जाता है
    धरती को उपजाऊ बनाता है
    अपने इर्द गिर्द जाने कितनी
    बस्तियां, नगर, गाँव बसाता है

    दरिया भूलने नहीं देता
    माटी को अपनी नरमी
    दरिया दूर करता है
    सदा माटी की गरमी
    दरिया बनाता है रास्ता जहां राह नहीं
    जंगल, पर्वत, खाई की भी परवाह नहीं
    बहा ले जाता है दरिया
    तमाम अवशिष्ट अपने साथ
    ले कर आता है दरिया
    निर्मल, स्वक्छ हवा अपने हाथ
    संस्कृति के रंग,
    संस्कारों की महक,
    शिक्षा और चेतना
    उत्साह और ललक,
    अक्षुण रखता है
    पीढ़ियों का....
    हस्तांतरित करता है
    पीढ़ियों तक...

    "अभियान भारतीय" एक दरिया है,.
    और दरिया..
    अपना कर्तव्य कभी नहीं भूलता,
    भुलाने देता भी नहीं....

    शुभकामनाएं.

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  5. आपकी सोच सकारात्मक है इसका मतलब आपके माता-पिता ने आपको अच्छे नैतिक संस्कार दिए...आज के युवा पथ भ्रष्ट हो रहे हैं तो इसके लिए भी हम ही जिम्मेदार हैं। कभी-कभी तो बच्चे माता पिता को ही अच्छे संस्कार देते देखे जाते हैं। मैं सुर्ती अपने बेटे से छुपा के ही खा पाता हूँ..देखता है तो उसे बुरा लगता है। मतलब यह कि हम सुधरेंगे जग सुधरेगा का मूल मंत्र भी अपने अभियान में शामिल कर लीजिए।

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  6. भारतीय जी!
    आश्चर्य है इतनी छति उम्र में इतनी गहरी सोच, इतनी जिम्मेदारी का एहसास वास्तव में अभिभूत तो करता ही है, यह आभास भी कराता है की अभि युवावों में भी संवेदनात्मक ऊर्जा, अनुभूति, कुछ कर गुजरने की जिजीविषा मिति नहीं है. यह गुण आपको निश्चित ही माता- पिता और गुरुजनों से मिला गोगा मै उन्हें यहीं से प्रणाम करता हूँ. आप बहुत दूर तक जायेंगे, सूर्य और चन्द्र की तरह चमकते रहो, दमकते रहो, अलख जागते रहो......हां एक वादा जरूर है जब कभी मेरी आवश्यकता हो बेझिझक कहिये, मुझे प्रसन्नता होगी. साथ खड़ा होने पर मुझे गौरव मिलेगा. अपना गौरव, मेरे समाज का गौराव . मरे राष्ट्र का गौरव्व्व्व ..................अपने नाम को सार्थक और चरितार्थ करो, यह सुझाव के साथ निवेदान भी है और आशा की ज्योति भी......तुझे संबल, सोच और नयी ऊर्जा मिलती रहे यही कामना है..............

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